संचार माध्यमों के रूप में सिनेमा बहुत शशक्त और लोकप्रिय माध्यम है , आज का वर्तमान युग मिडिया का युग है और इस मिडिया के युग में सिनेमा सबसे प्रभावशाली जनमाध्यम है ,समाज पर इसका गहरा प्रभाव है फ़िल्में आज हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गई है इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुके समाज पर यदि किसी का सबसे अधिक प्रभाव है तो वह सिनेमा ही है .जिसका असर हमारे खाने पीने , रहन सहन ,आदि सभी पर पूर्ण रूप से पड़ रहा है
पहली भारतीय फिल्म पुंडरीक सन 1912 में रिलीज हुई थी। बहरहाल तमाम वजहों से धुंडीराज गोविंद फाल्के की फिल्म राजा हरिश्चंद्र को भारतीय सिनेमा की शुरुआती फिल्म माना जाता है। फाल्के ने इस फिल्म का निर्माण और निर्देशन किया था। ऐसे वक्त में जब ज्यादातर फिल्में पश्चिमी पसंद वाले दर्शकों के समक्ष पेश की जाती थीं फाल्के ने इस माध्यम को भारतीय श्रोताओं के समक्ष भारतीय कहानियां कहने का जरिया बनाने की सोची। राजा हरिश्चंद्र 21 अप्रैल 1913 को रिलीज हुई और हिट भी हो गई। बाद में आठ भाषाओं में इसके 20 संस्करण रिलीज किए गए.
गैरजरूरी सामाजिक मान्यताओं, रूढ़ियों, अंधविश्वासों को
खत्म करने में हिन्दी सिनेमा ने अपनी अहम भूमिका अदा की है। साथ ही बदलते हालात
में उत्पन्न होती समस्याओं से निपटने के लिए लोगों को तैयार भी किया है। यहां तक
कि आजादी की लड़ाई में भी सिनेमा की भूमिका सीमित रूप में ही सही, पर रही है। कवि
प्रदीप के गीतों को याद करें। यह कोई साधारण काम न तब था, न अब है। आज सिनेमा
मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम है। दृश्य-श्रव्य माध्यम होने की वजह से यह हमारी
कल्पना शक्ति की एक सीमा निर्धारित करता है। दर्शक इससे आगे की कल्पना कम ही कर
पाता है। इस लिहाज से प्रभाव डालने में सिनेमा सबसे अधिक सक्षम है और यह अपनी इस
जिम्मेदारी को समझता भी है .
अब तक केवल मूक फिल्में ही बना करती थीं पर 1930 के आसपास
चलचित्रों में ध्वनि के समावेश करने का तकनीक विकसित हो जाने से सवाक् (बोलती)
फिल्में बनने लगीं। आलम आरा भारत की पहली
सवाक् फिल्म थी जो कि सन् 1931 में प्रदर्शित हुई। 1933 में प्रदर्शित फिल्म कर्मा इतनी अधिक लोकप्रिय हुई
कि उस फिल्म की नायिका को लोग फिल्म स्टार के नाम से संबोधित करने
लगे और वे भारत की प्रथम महिला फिल्म स्टार बनीं।
मूक फिल्मों के जमाने तक मुंबई (पूर्व नाम बंबई) देश में चलचित्र निर्माण
का केन्द्र बना रहा परंतु सवाक् फिल्मों का निर्माण शुरू हो जाने से और हमारे देश
में विभिन्न भाषाओं का चलन होने के कारण मद्रास में दक्षिण भारतीय भाषाओं वाली चलचित्रों का निर्माण होने लगा। इस तरह
भारत का चलचित्र उद्योग दो भागों में विभक्त हो गया।
उन दिनों प्रभात, बांबे टाकीज और न्यू थियेटर्स भारत के प्रमुख
स्टुडिओ थे और ये प्रायः गंभीर किंतु मनोरंजक फिल्में बना कर दर्शकों का मनोरंजन
किया करती थीं। ये तीनों स्टुडिओ देश के बड़े बैनर्स कहलाते था। उन दिनों सामाजिक
अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने वाली, धार्मिक तथा
पौराणिक, ऐतिहासिक, देशप्रेम से
सम्बंधित चलचित्रों का निर्माण हुआ करता था और उन्हें बहुत अधिक पसंद भी किया जाता
था। उस समय के कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय फिल्में हैं फिल्म
"दुनिया ना माने", फ्रैंज ओस्टन की
फिल्म "अछूत कन्या", दामले और
फतेहलाल की फिल्म "संत तुकाराम", मेहबूब खान की
फिल्में "वतन", "एक ही रास्ता" और "औरत", अर्देशीर ईरानी की फिल्म "किसान कन्या"
आदि।
व्ही. शांताराम की "डा. कोटनीस की अमर कहानी", मेहबूब ख़ान की "रोटी", चेतन आनंद की "नीचा नगर", उदय शंकर की "कल्पना", ख्वाज़ा अहमद अब्बास की "धरती के लाल", सोहराब मोदी की "सिकंदर", "पुकार" और "पृथ्वी वल्लभ", जे.बी.एच. वाडिया की "कोर्ट डांसर", एस.एस. वासन की "चंद्रलेखा", विजय भट्ट की "भरत मिलाप" और "राम
राज्य", राज कपूर की "बरसात" और
"आग" उन दिनों की अविस्मरणीय फिल्में हैं|
आरंभ में स्टुडिओ पद्धति का प्रचलन रहा। हरेक स्टुडिओ के अपने वेतनभोगी
निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, नायक, नायिका तथा अन्य
कलाकार हुआ करते थे। पर बाद चलचित्र निर्माण में रुचि रखने वाले लोग स्वतंत्र
निर्माता के रूप में फिल्म बनाने लगे। इन स्वतंत्र निर्माताओं ने स्टुडिओं को
किराये पर लेना तथा कलाकारों से ठेके पर काम करवाना शुरू कर दिया. चूँकि ठेके में
काम करने में अधिक आमदनी होती थी, कलाकारों ने
वेतन लेकर काम करना लगभग बंद कर दिया। इस प्रकार स्टुडिओ पद्धति का चलन समाप्त हो
गया और स्टुडिओं को केवल किराये पर दिया जाने लगा।

जब दादासाहब ने चलचित्र-निर्माण में अपना ठोस
कदम रखा तो इन्हें बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । जैसे-तैसे कुछ पैसों
की व्यवस्था कर चलचित्र-निर्माण संबंधी उपकरणों को खरीदने के लिए दादासाहब लंदन
पहुँचे । वे वहाँ बाइस्कोप सिने साप्ताहिक के संपादक की मदद से कुछ
चलचित्र-निर्माण संबंधी उपकरण खरीदे और १९१२ के अप्रैल माह में वापस मुम्बई आ गए ।
उन्होने दादर में अपना स्टूडियो बनाया और फालके फिल्म के नाम से अपनी संस्था
स्थापित की। आठ महीने की कठोर साधना के बाद दादासाहब के द्वारा पहली मूक फिल्म
"राजा हरिश्चंन्द्र" का निर्माण हुआ । इस चलचित्र (फिल्म) के निर्माता,लेखक, कैमरामैन इत्यादि
सबकुछ दादासाहब ही थे । इस फिल्म में काम करने के लिए कोई स्त्री तैयार नहीं हुई
अतः लाचार होकर तारामती की भूमिका के लिए एक पुरुष पात्र ही चुना गया । इस चलचित्र
में दादासाहब स्वयं नायक (हरिश्चंन्द्र) बने और रोहिताश्व की भूमिका उनके सात
वर्षीय पुत्र भालचन्द्र फालके ने निभाई । यह चलचित्र सर्वप्रथम दिसम्बर १९१२ में
कोरोनेशन थिएटर में प्रदर्शित किया गया । इस चलचित्र के बाद दादासाहब ने दो और
पौराणिक फिल्में "भस्मासुर मोहिनी" और "सावित्री" बनाई। १९१५
में अपनी इन तीन फिल्मों के साथ दादासाहब विदेश चले गए । लंदन में इन फिल्मों की
बहुत प्रशंसा हुई। कोल्हापुर नरेश के आग्रह पर १९३७ में दादासाहब ने अपनी पहली और
अंतिम सवाक फिल्म "गंगावतरण" बनाई । दादासाहब ने कुल १२५ फिल्मों का
निर्माण किया। १६ फरवरी १९४४ को ७४ वर्ष की अवस्था में पवित्र तीर्थस्थली नासिक
में भारतीय चलचित्र-जगत का यह अनुपम सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया ।